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मर्डन अंग्रेज़ी, मर्डर्ड हिन्दी : चेहरे समाज के

Published Date: September 14, 2016

आप हिन्दी ग़लत बोलो कोई कुछ नहीं बोलेगा पर अंग्रेज़ी भाषा का ऐसा चलन है कि आप दो लाईने ग़लत बोल के तो देखें । आज अंग्रेज़ी ही मापदंड है आपके पढ़े लिखे मर्डन होने का ।

Reference: ये शब्द ‘मर्डन’ पटना के एक “मर्डन टेलर्ज” नाम के दुकान के बोर्ड से प्रेरित है ।

मर्डनाइजेसन के दो चेहरे

“Basically I am in train, here the network is not coming, and hence your bhoice is cutting.”

उत्सुकता थी या नहीं पता नहीं, मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया, ” आप कहाँ जा रहे हैं।” और जवाब आया, ” टू दी कैपिटल।”

ये मेरी एसी बोगी की पहली यात्रा थी।  मैंने महसूस किया यहाँ हिंदी भाषा का कोई स्थान नहीं है। हिंदी बोले गए तो आपको स्लीपर की निग़ाह से देखा जायेगा ।

मेरे एक मित्र हैं जो नितीश कुमार के बहुत बड़े प्रशंसक हैं और अंग्रेजी भाषा के उससे भी बड़े । बताने की जरुरत नहीं कि वो कैसी अंग्रेजी बोलते हैं । एक बार मैंने उनसे हिंदी में नितीश कुमार के बारे में बोलने बोला । पहले ही शब्द ने मेरे होश उड़ा दिए । माननीय की जगह उन्होंने स्वर्गीय कह दिया । वो हिन्दी भाषी क्षेत्र से आते हैं इसलिए ये कथन हास्य रस का न होकर विभत्स का लगता है ।

खैर छोड़िये, वापस एसी बोगी में आते हैं । इन बोगियों में मुझे हमेशा सज्जन लोग ही मिले हैं । भाषा ऐसी कि शहद टपक रहा हो । प्रेम का वातावरण, माफ़ कीजिये लव का एनवायरनमेंट रहता है । एक बार ऐसे ही एक सज्जन की भाषा की मधुरता पर अचंभित था और यही सोचते सोचते सो गया । तभी भगदड़ की आवाज से नींद खुली । ट्रेन आसनसोल में रुकी थी और भागते हुए एक बच्चा पकड़ा गया था । ये सज्जन जोथोड़ी देर पहले मुझे एप्पल खिला रहे थे अभी उसे गालियां खिला रहे थे । नींद में आँख चार बार रगड़ा कि ये वो नहीं हैं, पर ये वही थे । भीड़ में एक । इन्साफ करने वाली भीड़ । बच्चे के मुंह से टपक रहा था इन्साफ ।

मुझे अचानक से वो भीड़ याद आती है जो मोमबत्ती लेकर कभी जेसिका तो कभी नीरज ग्रोवर के लिए इन्साफ मांगती है । दोनों भीड़ एक जैसी लगती है मुझे, दोनों में गुस्सा है । पर एक गुस्सा बड़े लोगों (समाज के परिप्रेक्ष्य में बड़े लोग) पर है, इसलिए मोमबत्तियां जलाई जाती हैं । वहाँ लाठी खाने का भी डर है और दिखावा भी । ये जो मेरे सामने है, ये गुस्सा निम्न वर्ग पर है । यहाँ पुलिस साथ है । वो भी इन्साफ की तलाश में हैं इसकी चमड़ियों से । डर यहाँ नहीं है ।

मेरे पिताजी कहते हैं कि मध्यम एवं उच्च वर्ग के व्यक्ति चाहे जिस भी उम्र के हो, निम्न वर्ग (घर के नौकर, रिक्शा वाले) को तुम कहकर ही पुकारते हैं । यहाँ उम्र नहीं इज्ज़त का आधार वर्ग है । वर्ग का आधार कौन तय करता है ये मुझसे मत पूछियेगा ।

मैं इस भीड़ को देखता हूँ । रोकने की हिम्मत मुझमें कहाँ । बस ट्रेन के जल्दी खुलने की सोचता हूँ । ट्रेन खुलती है और मैं इस भीड़ का हिस्सा बन अन्दर आ जाता हूँ । अभी भी उसकी बातें हो रही है । दिन भर अंग्रेजी झाड़ने वाले अभी उसके परिवार को हिंदी में याद कर रहे थे । मेरे चारो तरफ दो चेहरों में सने पुतले हैं । मैं भी उन जैसा ही खुद को महसूस करता हूँ ।

सुबह समय पर मेरा स्टेशन आ जाता है । मैं अपने शहर को उसकी ख़ुशबू से पहचानता हूँ । इस गंध से आप आश्वस्त हो सकते हैं कि यहाँ पानी की कोई कमी नहीं । मेरा तो एसी का ख़ुमार यहीं उतर जाता है । पर ये वापस उसी मोड में चले गए हैं । मेरे बगल से शिट शिट करते प्लेटफार्म पर थूकते निकल जाते हैं । मैं इनके थूक को देखता हूँ, बग़ल में खख़ार भी है । कोई अंतर नहीं दिखता मुझे । मतभेद समाप्त हो रहे हैं । खख़ार का मर्डनाइजेसन हो गया है ।

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गली से एक सज्जन दीवार पर थूकते हुए निकल जाते है । मकानमालिक भभुआते हुए बाहर निकल के चिल्लाता है, “साले दिखता नहीं यहाँ लिखा है, DO NOT SPLIT. (Read Spit) “
सज्जन घूम कर जवाब देते है, ” अगर इतना ही पढ़ा लिखा होता तो रोड पर थूकता ।

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Innocent? Is that supposed to be funny? A woman… so ugly on the inside she couldn’t bear to go on living if she couldn’t be beautiful on the outside ~ From the movie “Se7en”