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मोबाइल और मानव

Published Date: May 24, 2015

आज का विश्व ‘मोबाइलमय’ है। मोबाइल आज से करीब पंद्रह वर्ष पूर्व किसी क्रांति की तरह आई और बस छा ही गई – हरजगह। आज मोबाइल इंडस्ट्री किसी विशाल समंदर सा है जिसमे कई कंपनीया रचनात्मकता और कल्पना के जहाज़ लिए गोते लगा रही हैं। रोज नए मोबाइल बाज़ार में धड़ल्ले से आ रहें हैं और फिर उतनी ही जल्दी पुराने होकर गुम भी हो जा रहे हैं। सच कहूं तो अगर मोबाइल के बाज़ार-भाव को उसकी आयु का पैमाना बनाया जाय तो कुछएक मोबाइल तो अधिकतर कीड़ों से भी कम जीते हैं। लेकिन कीड़े जितने दिन भी जीते हैं हँसते, कूदते और क्रीड़ा करते ही व्यतीत करते हैं। पर क्या मोबाइलों को हम ऐसी छूट देते हैं। क्या उनकी जिंदगी सच में उनकी जिंदगी है?

अब आप सोच रहे होंगे कैसी बेतुकी और बिना सर-पैर की बातें हो रहीं हैं? कहीं मोबाइल की भी जिंदगी होती है? मोबाइल भी कहीं हँसता, खेलता या कूदता है? लेकिन मुझे गलत मत समझिये। एक साहित्यकार तो यही करता है। अपनी कल्पना के तारों से वह ऐसे पात्रों, परिस्थितिओं और भावनाओं को जोड़ता है जो थोड़ी अटपटी बैठतीं हों लेकिन फिर उन्हीं के बीच संबंध और तालमेल बिठा कर और मज़े और आश्चर्य के लेप लगा कर आपके सामने परोसता है। इसीलिए मेरा विश्वास करिए और पढ़ते जाइये।

वैसे मैं भी इस बात का पक्षधर हूँ कि मोबाइल या मशीनों में कोई भावना ना ही हो तो बेहतर है। मशीनें अगर इंसान से कोई काम जल्दी या बेहतर ढंग से करतीं हैं तो इसका एक कारण यह भी है कि उनके अंदर कोई भावना नहीं है। जरा सोचें कैसा हो अगर आपके मोबाइल के किसी बटन में और स्क्रीन में छत्तीस का आंकड़ा चल रहा हो। इधर हम बटन दबा कर मरे जा रहें और वहाँ स्क्रीन उसे उकेर ही न रहा हो। होगी न मोबाइल की कार्यक्षमता बाधित? मनुष्य भी अपने कई कार्य भावनाओं में बह कर करते हैं जिससे कई बार उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। कई बार झगडे, मनमुटाव, अभिमान और दंभ से हम अपने काम को अधिक पेचीदा, मुश्किल और समयखाऊ बना देते हैं ।

ख़ैर अब जब बात मोबाइल की हो रही है तो मैं बता दूँ  कि मेरे पास भी एक मोबाइल है-काली, पतली और एकदम नयी। लेकिन जब भी इसे देखता हूँ यह मुझे एक पर्दा ही लगता है। काला और मोटा सा पर्दा। एक ऐसा पर्दा जिसके आर पार क्या है भेदा न जा सके। और पर्दे के दोनों ओर लोग एक दूसरे को मूर्ख बनाने में लगे हैं। और नहीं तो क्या? आप भी करते हैं ऐसा। याद नही आ रहा क्या? जरा सोचिए तो, जरा दिमाग़ पर ज़ोर तो डालिए। यही तो जब आपके दोस्तों ने एप्लाइड-मैकेनिक्स के क्लास में प्रॉफेसर की नौटंकी के बजाय “दि मशीनिस्ट’ में क्रिस्चियन बाले का अभिनय देखने की चाह गढ़ ली। और फ़िर सन्यासी तो आप भी नहीं। थोड़ी लज्जा दिखायी ना-नुकुर किया और फ़िर पिघल ही गए आख़िर में। निकल तो गए सिनेमाघर पर घर पर क्लास का ही पता बताया। अब आपकी फूटी किस्मत कि घर वालों को भी जरुरी कार्य तभी याद आती है जब आप मज़े में हों। मोबाइल का यही तो खामियाजा है साहब। जिसे जब मन किया अपनी सहूलियत से घुमा लेता है लेकिन पिसता तो हमेशा चोंगा उठाने वाला ही है। हरदिन जब कक्षा में फोरिएर सीरीज का अगला पद दिमाग़ की नसों को खिंच असहनीय झंकार बजाता है औऱ जब यह इच्छा रहती है कि कोई फ़ोन आ जाये और बकर कर समय काट लें  तब तो कोई फ़ोन नही आता?खैर स्क्रीन चमक रहा था और दबे मन से  मोबाइल के बटन को दबाया आपने। औऱ फिर जुट गए सिनेमाघर के कोलाहल को क्लास का शोर-शराबा बताने में औऱ वहाँ की घंटी को क्लास की घंटी बताने में। अब यहाँ मेरे दोस्त जो  नयी टेक्नोलॉजी के पैरोकार हैं मेरी भद्द उड़ाने का मौका नही गवायंगे। कहेंगे यहाँ तुम कलम ही चलाओ और यहाँ हम विडियो कोंफ्रेंसिंग और कॉल से सरकार और जगत चला रहे हैं। लेकिन मैं भी कहूंगा कि आपको कौन सी सरकार चलानी है? आपको तो मतलब साधना है बस। और कितने विडियो कॉल किए हैं आपने? एक सामान्य सा लोकल कॉल करने में तो आपकी दिग्घी बंध जाती है खर्च के डर से।और जो मानव पूरी मोबाइल बना सकता है उसे मोबाइल के स्क्रीन को सजाने में कितना वक्त लगेगा। आप भी जानते हैं कि सब से चौड़ा मोबाइल भी 5*5 इंच का ही राज खोल सकेगा। आपके बग़ल की पूरी दुनिया नही दिखायेगा। अब जरा सोचिए कि बेचारे मोबाइल पर क्या बीतती होगी? उससे आप रोज के 10 सफ़ेद  झूठ उगलवाते हैं। लेकिन मोबाइल तो ठहरा गांधी भक्त, आपकी आवाज़ से साफ उसने अगल बग़ल की आवाज़ सुना दी। औऱ जब आपका सफ़ेद झूठ पकड़ा गया तो आपने अपने गुस्से का इज़हार बेचारे मोबाइल पर ही किया। झुंजला के फ़ेंक दिया उसे और पटक दिया बिस्तर पर। अब उसकी और अशोक खेमका की हालत में क्या अंतर?बेचारा मोबाइल तो आज भी ग़ुलाम है।

औऱ पता नहीं दिन में कितने घंटे कॉरिडोर में चहलक़दमी करते, बाग में बैठे, सोते-जागते हम अपनी प्रेमिकाओं से बात करते बिताते हैं और बेचारा मोबाइल तो बस देखता ही रहता है। कभी कभी प्रियतम की कोई बात सुन खुशी और उत्तेज़ना की लहर खून बनकर नसों में दौड़ कर शरीर को गर्म कर देती है। उधर मोबाइल भी गर्म होता है गुस्से, ख़ीज और अनायास तपने से।

और हम क्या-क्या नही करते हैं? कभी उसके अंदर एंग्री बर्ड फोड़ते हैं तो कभी उसकी चपाट स्क्रीन पर गाड़ियां दौड़ाते हैं। और तो और समय की खबर भी हम उसी से लेते हैं, वातावरण भी उसी से पूछते हैं और रास्ता भी उसी को दिखाने कहते हैं। बेचारे को सोने भी कहाँ देते हैं? जब सोने की बारी आती है तो खुद तो सो जाते हैं पर उसे रात भर जगाते हैं-अलार्म लगा कर। अलार्म के प्रभाव से बेचारा मोबाइल इतना अलर्ट रहता है कि सोता ही नहीं यह सोच कर की कहीं आँख लग गयी तो मालिक के गुस्से का कारण न बनना पड़े। पर जब सारी रात जाग कर कर्तव्यपरायण मोबाइल हमें निश्चित समय पर जगाने की चेष्टा करता है तो उल्टे हम उसी को कूटते हैं। और तब मोबाइल को लगता है कि जगाने की कोशिश कर उसने और भी बड़ी गलती कर दी है।

ऐसे  ही न जाने कितनी बार हम मोबाइल से काम लेकर उसकी अवहेलना करते हैं। तो अगली बार जब आपके मोबाइल से कोई आवाज़ न आ रही हो, वह ठीक से चार्ज न हो रहा हो, गलत समय बता रहा हो या आपका आदेश न मान रहा हो तो उसे किसी मोबाइल रिपेयरिंग शॉप में देने से पहले यह सोचियेगा कि कहीं आपका मोबाइल आपसे बिगड़ा तो  नही हुआ है? इससे आप मोबाइल को इंसान मान उसपर कम अत्याचार तो करेंगे ही साथ ही आपके व्यक्तित्व में भी खासा सुधार होगा।आप झूठ बोलने से बचेंगे यह सोच कर कि मोबाइल कहीं सच न बता दे। जब आपका मोबाइल लगातार बात करने से गर्म हो जाये तो आप यह सोचंगे कि कहीं वह गुस्से में तो नहीं है? इससे आप समय भी कम बर्बाद करंगे और मेज पर लौट किताब ही दोहराएंगे मोबाइल के बिना। और जब अलार्म बजेगा तो आप सही समय पर उठेंगे यह सोच कर कि मोबाइल को ख़राब न लगे। और अपने रास्ते भी आप याद रखंगे ताकि जब मोबाइल आप के पास न हो तो आप खुद ही राह ढूंढ लें, भटके नहीं। इससे आप स्वयंनिर्भर भी बनेँगे। यानि भले ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मोबाइल को भावनाओं वाला मानना गलत है लेकिन फायदा तो है। इसीलिए तो कहते हैं कि साहित्य भले ही काल्पनिक हो लेकिन मनुष्य अगर  उचित मानसिकता से इसका दोहन करे तो फायदा ही पहुँचता है! है कि नहीं?