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नए राजनीति की दिशा ?

Published Date: April 1, 2015

अमूमन अपने लेख के जरिये मैं किसी सवाल का जवाब देने की कोशिश करता हूँ।  लेकिन आज यह टेक छोड़ते हुए मैं ही आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ। देश बदलने की जो यात्रा आज से चार साल पहले शुरू हुई थी उसकी दिशा अब क्या हो ?

पिछले हफ्ते भर की घटनाओं ने अब इस सवाल को सार्वजनिक कर दिया है।  जैसा मीडिया अक्सर करता है, इस सवाल को व्यक्तियों के चश्मे से देखा जा रहा है। देश के सामने पेश एक बड़ी दुविधा को तीन लोगो के झगड़े या अहम की लड़ाई के तौर पर पेश किया जा रहा है। ऊपर से स्टिंग का तड़का लगाकर परोसा जा रहा है। कोई चस्का ले रहा है, कोई छी-छी कर रहा है तो कोई चुपचाप अपने सपनों के टूटने पर रो रहा है। बड़ा सवाल सबकी नज़र से ओझल हो रहा है।

आज से चार साल पहले जंतर-मंतर और रामलीला मैदान से एक नयी यात्रा शुरू हुई थी। पैंसठ साल से तंत्र के तले दबे लोक ने अपना सर उठाया था। हर शहर, हर कस्बे ने अपना जंतर-मंतर ढूंढ लिया था, हर गाँव ने अपना अन्ना खोज निकाला था। घोटालों के विरुद्ध शुरू हुई यह यात्रा धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कारवाँ बन गयी। भ्रष्टाचार की गंगोत्री को रोकने की कोशिश इस यात्रा को चुनावी राजनीति के मैदान तक ले आई। राजनीति का विकल्प बनने  के बजाय यह आंदोलन वैकल्पिक राजनीति का वाहन बनता दिखाई दिया।

​आज यह यात्रा जिस पड़ाव पर खड़ी है, वहां कुछ बुनियादी सवालों का उठना लाज़मी  है। क्या इस आंदोलन का राजनैतिक वाहन वैकल्पिक राजनीति की जगह सामान्य पार्टियों जैसा एक चालू राजनैतिक विकल्प बनेगा ? पूरे देश में बदलाव का बीड़ा उठाने वाले क्या सिर्फ ​दिल्ली का क्षेत्रीय दल बनाकर रह जायेंगे ? स्वराज का मंत्र लेकर चली इस यात्रा का ‘स्व’ कहीं एक व्यक्ति तक सिमट कर तो नहीं रह जायेगा ? मतलब, इस आंदोलन का राजनैतिक औज़ार कहीं इस आंदोलन की मूल भावना से ही विमुख तो नहीं हो गया ?

जो सवाल आज सार्वजनिक हुए हैं वो मेरे और प्रशांत भूषण जैसे सहयात्रियों के मन में बहुत समय से चल रहे हैं। इस यात्रा के भटकाव के चिन्ह बहुत समय से दिख रहे थे। कुछ साथी उन मुद्दों को उठाकर यात्रा छोड़ भी चुके थे। लेकिन हम दोनों जैसे अनेक साथियों ने तय किया कि इस सवालों को अंदर रहते हुए ही सुलझाने की हर संभव कोशिश करेंगे। चूंकि तोड़ना आसान है और बनाना बहुत मुश्किल। एक बार लोगों की आशा टूट जाये तो फिर भविष्य में कुछ भी नया और शुभ करना असंभव हो जायेगा। हमारी दुविधा यह थी कि आंदोलन की एकता भी बनाये रखी जाय और इसकी आत्मा भी बचायी जाय। एक तरफ यह खतरा था कि कहीं हमारी भूल से इतना बड़ा प्रयास टूट न जाये,  कहीं देश भर में फैले हुए कार्यकर्ताओं की उम्मीदें न टूट जाएँ तो दूसरी ओर यह खतरा था की हम कहीं पाप के भागीदार ना बन जाएँ, कल को ये न लगे कि सब कुछ जान-बूझते हम इस आंदोलन के नैतिक पतन के मूक दर्शक बने रहे।

आज इस आंदोलन के कार्यकर्ता, समर्थक और शुभचिंतक एक तिराहे पर खड़े हैं। एक रास्ता है कि हम जहां से आये थे वहीं वापिस चले जाएँ। यानी राजनीति को छोड़ दें और अपने अपने तरीके से समाज की सेवा में लग जाएँ। दिक्कत ये है कि ऐसा करने से लोकतंत्र मजबूत होने की बजाय और कमजोर हो जायेगा। ‘राजनीति तो गन्दी ही होती है’ वाला विचार लोकतन्त्र की जड़ काटने का काम करता है। राजनीति को छोड़ देंगे तो लोकतंत्र को कैसे सुधारेंगे?

दूसरा रास्ता है कि इसी वाहन को ठोक-पीट कर ठीक किया जाय। कई लोगों की राय है कि पिछले दिनों की गलतियों को सुधारने के लिए कोर्ट-कचहरी या फिर चुनाव आयोग की शरण ली जाय। इसमें कोई शक नहीं कि 28 तारीख को आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में जो कुछ हुआ वह पार्टी के संविधान और लोकतंत्र की मर्यादा के बिलकुल खिलाफ था। लेकिन क्या इस मामले को खानदानी जायदाद के झगड़े की तरह कोर्ट-कचहरी में सालों तक घसीटा जाय ? लोकतान्त्रिक राजनीति में सबसे बड़ी अदालत तो जनता की अदालत होती है। अगर कोर्ट-कचहरी नहीं तो फिर और किस तरीके से इस वाहन को सुधारा जाय ? जहाँ हर मतभिन्नता को विद्रोह करार दिया जाय, वहां भीतर से बदलाव कैसे हो ?

तीसरा रास्ता एक नयी किस्म की राजनीति की ओर  ले जाता है। ऐसी राजनीति जो स्वराज के आंदोलन की मूल भावना के अनुरूप हो। राजनीति का विकल्प बनाने या सिर्फ चालू राजनैतिक विकल्प बन जाने की जगह एक सच्चे अर्थ में वैकल्पिक राजनीति का रास्ता। सवाल है कि कैसी होगी यह राजनीति ? इसका वैचारिक ताना-बाना क्या होगा ? तात्कालिक सफलता के लालच से मुक्त कैसे रहा जाय ? अपने नैतिक आदर्शों से समझौता किये बिना सफलता कैसे हासिल की जा सकती है ? और, यह भी कि क्या दूध से जली जनता क्या ऐसे किसी नए प्रयास से जुड़ेगी ?

ये मेरे और प्रशांत भूषण  के प्रश्न नहीं है। यह आज पूरे देश के प्रश्न हैं। आपके प्रश्न हैं। इस बार उत्तर भी आप ही देंगे।