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‘कवि-नीरज’ के मर जाने से, ‘शब्द-नीरज’ नही मरा करता है !

Published Date: July 20, 2018

“छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ लुटाने वालों !

‘कवि-नीरज’ के मर जाने से, ‘शब्द-नीरज’ नही मरा करता है !!”

मुझे ठीक-ठीक याद नही है, शायद वर्ष 2010 ही रहा होगा. उस समय मैं बोकारो में सेक्टर 5 के क्वार्टर नंबर 1025 में रहता था, अपने एक मित्र के साथ. इस क्वार्टर के ठीक सामने एक विशाल मैदान है. अचानक एक दिन खबर मिली कि यहाँ एक कवि-सम्मलेन आयोजित होने जा रहा है. हिंदी साहित्य में बेशुमार रूचि शुरू से ही थी, अतः कवि-सम्मलेन का लुफ्त मैं किसी भी कीमत पर छोड़ना नही चाह रहा था. फैसला किया कि आज रात कवि-सम्मलेन में ही बिताऊंगा.

सम्मलेन शुरू होने से पहले ही कोने की एक कुर्सी पकड़कर बैठ गया. अच्छी-खासी भीड़ थी. पता किया तो ‘नीरज’ जी आ रहे थे. जी हाँ, वही गोपालदास ‘नीरज’ जो आज चुपके से अनंत की यात्रा पे निकल गए. वही नीरज, जिन्होंने हिंदी-साहित्य में कविता की श्रंखला को एक नया आयाम दिया, एक नयी पहचान दी. वही नीरज, जिनकी सृजनात्मक भाषा, जनमानस की भाषा थी.  वही नीरज, जिनके द्वारा लिखी गयी फ़िल्मी गीतें जैसे ‘लिखे जो ख़त तुम्हे, हज़ारों रंग के नज़ारे बन गए’, ‘रंगीला रे तेरे रंग में’, ‘ऐ भाई! जरा देख के चलो’, ‘फूलों के रंग से, दील की कलम से, भारतीय फिल्म एवं संगीत जगत के कालजयी गीतों की श्रेणी में शुमार किया जाता है. राजकपूर एवं देवानंद जैसे चर्चित फिल्म अभिनेता भी नीरज के प्रशंसकों में शुमार थे.

उस रात कवि-सम्मलेन में नीरज जी ने एक अदभुत माहौल सृजित कर दिया था. सारी रात लोग उनकी कविताओं पर झूमते रहे, हँसते रहे, गाते रहे और खिलखिलाते रहे. बीच-बीच में अपनी कुछेक कविताओं से उन्होंने श्रोताओं को भाव-विह्वल भी किया. श्रोताओं से संवाद की उनकी अपनी एक अनोखी शैली थी. सम्प्रेषण की कला अदभुत थी, इसके जादूगर थे. उनका इस तरह से छोड़कर चला जाना, अन्दर तक मर्माहत करता है.

जब कभी भी जीवन में अन्दर से खाली एवं बेचैन महसूस किया हूँ, उनकी कविता ‘कुछ सपनो के मर जाने से, जीवन नही मरा करता है’ ने मन-मष्तिष्क में एक अलौकिक ऊर्जा का संचार किया है, जीने की नई वजह दी है. उनकी इस कविता में अनंत ऊर्जा है, हार-चुके ह्रदय में जिजीविषा सृजन करने की अदभुत शक्ति है.

आज नीरज जी हमलोगों के बीच से चुपके से विदा ले लिए. मेरे जैसे उनके अनगिनत प्रशंसक जहाँ भी होंगे, आज उन्हें चुपके से दो-बूंद आंसू का अर्ध्य जरुर दे रहे होंगे. जीवनपर्यंत साहित्य की सच्ची साधना करने वाले नीरज जी ने आज जीवन के सबसे बड़े सार्वभौमिक सत्य से साक्षात्कार हेतु प्रस्थान किया है.

आखिर, रचनाकार रहता कहाँ है, रह जाती है तो सिर्फ उसकी रचना. आदमी रहता कहाँ है, रह जाती है तो सिर्फ उसकी कृति. नीरज जी अपने शब्द-शब्द में जीवित हैं, अपने पुरे हुंकार के साथ, अपनी पुरी गूंज के साथ. साहित्य-जगत के इस सशक्त हस्ताक्षर को उनकी अंतिम अनंत यात्रा पर अश्रुपूरित श्रधांजली.