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दीप कथा ..

Published Date: October 24, 2022

दीप तुम अब भी ऐसे हो? आज दिवाली है, कहो कैसे हो?

चमचमाती, इठलाती, बलखाती, बिजली के बल इतराती, विद्युत लड़ियों ने शांत एकांत, टिमटिमाते मिट्टी के दीए से उसका हाल पूछा। हाल तो क्या पूछना था, ऐसा लगा जैसे एल ई डी लाइट ने लालटेन को मुंह विराया हो। हेहेहे, अभी भी जिंदा हो, बंधु!

दीपक ने पीढ़ियां देखी थी, युग आए गए, ज़माना बदला, सभ्यताएं बदली, परंतु मनुष्यता के हाथ में अंधकार को दूर करने का पहला शस्त्र, दीपक, आज भी ज्यों का त्यों था।

मिट्टी का तन, तेल की ऊर्जा, प्राणों की बाती, और प्राणों के प्रज्वलमान होने से निकली लौ। प्रकाश की लौ। जब तक चली, जब तक जली, तब तक जीवन।

लड़ियों में सतत प्रकाश था, बिजली की घनीभूत ऊर्जा पर पूर्ण नियंत्रण था।

ये देखो, प्रकाश हमारे मुट्ठी में, हंसकर बिजली के बच्चो ने, जैसे दीपक के जिजीविषा पर ही व्यंग कर दिया हो।

दीप, तुम्हारी उपयोगिता क्या है? तुम जो प्रकाश देते हो वो हमारी लाइटों के सामने कुछ भी नही है। दीप तुम बस परंपरा हो, रस्म रिवाज हो, पुरानी याद है, प्रतीक हो, पूजा की थाली हो। तुमसे लोगो की प्रकाश की भूख नहीं मिटती। तुम अब आवश्यकता नहीं हो, महज सजावट हो। प्रकाश तो हम लाते हैं। हम, बिजली के बच्चे। सारी आधुनिकता हम से है। हमारी नसों में ऊर्जा गतिमान है। हम आज हैं। हमीं से कल है।

दीपक शांत था। मुस्कुराते हुए बोला। बिजली के बच्चों, तुमने सही कहा, तुम उपयोगिता हो। महज एक वस्तु हो। तुम्हारी ऊर्जा नियंत्रित है। तुम एक मशीन हो, एक रोबोट। तुमसे काम ज्यादा सुगम हो गया। पर, पर तुम में जीवन नही है। तुम जीवित नहीं हो, तुम में प्राण नही हैं।

जिसकी ऊर्जा न बंधे वो जीवन। प्रतिपल नवीन लौ जलता हो तो, जीवन। असुरक्षा में है, जीवन। अनियमितता में हो नियम, तो है जीवन। जैसे देखो, हवा मेरी सहचरी। उससे मेरे प्राण बंधे हैं। पर हवा के वेग ही मुझे बुझाते हैं। जीवन में जैविकता है। अस्थायित्व की सुंदरता है। क्षण प्रतिपल जीवन की लौ बनती है, और खुले आकाश की ओर बढ़ती है। क्षण प्रतिपल ये लौ जन्म लेती है और मिट जाती है। जो मिट जाए वो मिट्टी है। मैं मिट्टी की बनी हूं। मैं जीवन हूं। मैं दीप हूं।

प्रकाश आवश्यकता तब भी थी, अब भी है। बाहर नगर में तुमने खूब रोशनी की। अंदर नगर में अभी भी घुप्प अंधेरा है। जंगल है, जंगली जानवर हैं। विवेक की लौ न जले तो सब अबूझ पहेली ही है। मैं विवेक का प्रतीक हूं, वैसी ही जैविक, वैसा ही ऊर्ध्व। उतना ही जीवंत। मैं दीपक हूं।

शुभ दीपावली 🪔