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छठ महापर्व

Published Date: October 30, 2022

छठ पूजा लोक आस्था का महापर्व है। एक लोकोत्सव है। ये पर्व कई मामलों में बड़ा अनूठा है, विशेष है। सब से बड़ी विशेषता तो ये है की इस पर्व की विशेषता बताने वाला कोई शास्त्र नही है। एकमात्र ऐसा पर्व जिसका किसी शास्त्र में कोई उल्लेख नहीं। और ये मनाया जा रहा है हजारों सालों से, कब से किसी को नहीं पता। सही मामले में लोक आस्था और लोक स्मृति का अनुपम पर्व है छठ पूजा। इस पर्व के समस्त शास्त्र लोक गीतों में छिपे हैं, उसके परे कुछ भी नहीं। बिना किसी शास्त्र के सहारे, पांडित्य पूर्ण विवेचना के सहारे ये पर्व बिहार और पूर्वांचल में हजारों सालों से सबसे प्रमुख पर्व कैसे बना रहा यह समझने योग्य है।

नदियों को, वन को, वृक्ष, पौधो, औषधियों, धरती को, पहाड़ को, सागर को, वायु, अग्नि, मेघ, समस्त चर अचर को व्यक्ति के रूप में देखने और पूजने की सनातन परंपरा है। ये परंपरा अद्भुत है। जहां पाश्चात्य प्रभावित आधुनिक न्यायशास्त्र नदियों को वैधानिक व्यक्ति की मान्यता देकर गौरवान्वित होता है, वहीं इस देश की सनातन संस्कृति और परंपरा ने प्रकृति के हर अव्यय को व्यक्तिकता दी है, पूजनीयता दी है। आखिर प्रकृति में सब एक दूसरे से गूथे हुए हैं, इसका बोध शुरू से था हमारे पूर्वजों को। सार्वभौकिक अखंडता का इससे बड़ा क्या उदाहरण हो सकता है।

छठ पर्व इस सनातन परंपरा को एक कदम आगे बढ़ाता है। कभी सोचा है आपने ये छठी मैया कौन हैं? कौन सी देवी हैं ये जिनका किसी शास्त्र में वर्णन नहीं। छठी मैया इस महापर्व की व्यक्तिकता हैं। हमारे पूर्वजों ने इस पर्व को ही देवी मान लिया। यह एक अद्वितीय उदाहरण है जिसमे भावना और श्रद्धा को व्यक्तिकता, ईश्वरीयता से पूर्ण माना गया। इसलिए इस पर्व का अनुष्ठान का अत्यंत ही पवित्रता से किया जाता है, कोई भी भूल चूक नहीं। क्युकी की आपने जब छठ पूजा का व्रत लिया तभी से आपने छठी मैया को स्वयं को समर्पित कर दिया। पूजा की प्रक्रिया, साधना ही साध्य बन गया।

दूसरी बात जो विचारणीय है की इस व्रत में किसकी पूजा की जाती है और कैसे की जाती है। अब विधियों का कोई शास्त्र तो है नही तो इस की रीतियों से ही समझना होगा। इस पर्व में सर्व प्रमुख भगवान सूर्य की पूजा की जाती है, उनको प्रसाद चढ़ाया जाता है, अर्घ्य दिया जाता है। सूर्य से बड़ा साक्षात देव और कौन हो सकता है? प्रकृति में जीवन और ऊर्जा के समस्त श्रोतो का उद्गम स्थल सूर्य ही तो हैं। जो भी हमें प्राप्य है वो आदित्य देव का ही तो दिया है। फिर हमारे पालक कौन हुए? सूर्य देव के बिना तो इस सौर मंडल में जीवन अकल्पनीय है। सो, आदित्य की सर्वप्रमुख पूजा।

अब देखिए, पूजा करनी कैसे है? सूर्य के बाद वो कौन सा प्राकृतिक अव्यय है जिसपर हमारी सभ्यता निर्भर करती है? जल। जल से जीवन है। इसलिए इस पर्व में सूर्य पूजा जल के प्राकृतिक स्रोतों के साथ होती है। प्रकृति की पूजा तो प्रकृति की शरण में ही हो सकती है, जल के श्रोतों की आप मूर्ति नहीं बना सकते। हमारी नदिया, तालाब, पोखरे सब पूजनीय हैं। इसलिए पूजा अधूरी है बिना जल के श्रोत के।

तथाकथित आधुनिकता और विकासीलता के प्रदुर्भाव से सबसे अधिक क्षति पहुंची है जल के प्राकृतिक श्रोतों को। हम धरती की भीतर जल खोजने लगे और धरती मां के आंचल में जो जल के श्रोत थे उनको प्रदूषित करना शुरू कर दिया। छठ पूजा की पवित्रता जल के श्रोतों की पवित्रता को बनाए रखने का जीवंत संदेश देती है।

पुनः इस पूजा में कंद, मूल और फल से सूर्य भगवान को अर्घ्य दिया जाता है। तेरा तुझको अर्पण। सब कुछ सूर्य देव का ही तो दिया है।

भावना है की प्रकृति की पूजा, प्राकृतिक रूप से उपलब्ध वस्तुओं से। आस पास मिलने वाले लगभग सभी कंद, मूल और फलों का प्रयोग होता है। देखना होता है, कुछ छूट न जाए। जैव विविधता का सरक्षण करने के लिए हमारे पूर्वज किसी पुस्तक को नहीं पढ़ते थे। उनके रीति रिवाजों में ही ये संरक्षण निहित हैं। सुथनी, आमरस और भी कई ऐसे फल हैं जिनको हम जानते भी नहीं की कैसा होता है अगर बचपन से छठ पूजा नही देखा होता।

सभी विशेषताओं का वर्णन तो यहां संभव नहीं पर सामुदायिक भावना, सामाजिक समरसता, और सामाजिक एकता का संदेश जो ये पर्व देता है वो अनुकरणीय है। कैसे? इस पर्व को आप अकेले अपने घर में नही मना सकते। इसको सामुदायिक रूप से जल श्रोतों के पास सबके साथ मनाना होता है।इस पूजा में पारंपरिक विवाहोत्सव की तरह सभी जातियों का विशेष महत्व होता है। बांस की दौरी और सूप के बिना पूजा नहीं। और पूजा सबको एक ही घाट पे करनी होती है। प्रकृति माता के शरण में सभी समान हैं। इस पूजा में कोई ब्राह्मण नहीं, कोई शुद्र नही। कोई मंत्र नही, कोई पांडित्य और संस्कृत की आवश्यकता नहीं। सब बराबर हैं। घर के लोग नहा धोकर अर्घ्य दिला सकते हैं, किसी भी जाति के हों।

किसी दान दक्षिणा की रीति नही है। लेकिन व्रतियों के हाथ से प्रसाद लेने की परंपरा है। लगभग दो दिन और दो रातों के तप और सात्विकता के बाद व्रती का इष्ट के साथ एकाकार हो जाता है। जिसने व्रत नही किया वो व्रतियों का आशीर्वाद लेते है, जातीय श्रेष्ठता का महत्त्व नहीं। तप और भक्ति सबको पूज्य बनाती हैं।

अंत में अगर इस पर्व की कठिन व्रत की चर्चा भी उपयोगी है। अद्यितीय। नहाय खाय के दिन शुद्ध सात्विक आहार के साथ व्रत का संकल्प, अगले दिन पूरे दिन निर्जला व्रत, रात में हल्का प्रसाद। फिर षष्ठी या छठी के दिन पूर्ण व्रत, निर्जला। साथ में व्रत के सारे काम भी करने हैं, प्रसाद की तैयारी, धोना सुखाना। मशीन नही चलेगा। आप अमीर हों या गरीब छठ घाट पे प्रसाद की दौरी या दौरा सर पे ही रख के ले जाना है। शारीरिक श्रम के बिना कौन प्रकृति के करीब जा सकता है?

व्रत में मांगते क्या हैं? अपने परिवार की मंगल कामना। जो जरूरत हो मांग लो। मोक्ष नही, पुत्र, पुत्री, पति, पत्नी, धन समृद्धि कुछ भी। प्रत्यक्ष देव का ही दिया है सब, बालक को पालक से मांगने में संकोच कैसा? जितना सकाम है ये पूजा उतना ही निश्छल। अगर नही मांगना हो तो जो छठी मैया ने दिया उसी का आभार प्रकट करना है। पूजा अपने मन मुताबिक। प्रार्थना अपनी भाषा में। लोकगीत ही प्रार्थना है। कोई बालक अपनी मां से कुछ मांगने के लिए संस्कृत पढ़ता है क्या?